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ज़कात क्या है और रमज़ान में ही इसे क्यों अदा करते हैं ?

 इस्लाम में रमज़ान को बेहद पाक महीना माना गया है. अल्लाह की रहमत बरसाने वाले रमज़ान माह में नमाज़ और रोज़े के साथ ज़कात (Zakat) की भी परंपरा है. सबसे बड़ी इबादत मानी जाने वाली ज़कात को किसे देना चाहिए और किसे नहीं, इसका पूरा नियम जानने के लिए जरूर पढ़ें ये लेख. know-who-is-eligible-for-zakat-in-ramadan

रमज़ान (Ramzan) का महीना चल रहा है. मुसलमान बड़े पैमाने पर नमाज़ और रोज़ों की पाबंदी कर रहे हैं. मस्जिदें आबाद हैं. नमाज़ियों से खचाखच भरी हुई हैं. देश में अमन सुकून के साथ ही गुनाहों की माफ़ी के साथ मुसलमानों के रोज़गार और तरक्क़ी की दुआएं मांगी जा रहीं हैं. मुस्लिम इलाक़ों में बाज़ारों की रौनक़ देखते ही बनती है. रमज़ान में इन इलाकों में लगभग रात भर ही बाज़ार खुलते हैं. दरअसल ये तस्वीर का एक रुख है. जितने मुसलमान रौनक़ का हिस्सा बनने और इससे आनंदित होने के लिए बाज़ारों में दिखते हैं उससे कहीं ज़्यादा अपने घरों में छिपे रहते हैं. इस उम्मीद के साथ कि काश कोई उनके हालात को देख कर ईद (Eid) से पहले चुपके से उनकी आर्थिक मदद करने आ जाए.

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अमीर मुसलमान अपनी जायदाद की ज़कात सही समय पर सही जगह नहीं पहुंचाते. इसकी वजह ज़कात को लेकर आम मुसलमानों में सही जानकारी का अभाव है. इस लेख में ज़कात से सही मायने और इसके असली मक़सद को जानने की कोशिश करेंगे. दरअसल ज़कात (Zakat) अरबी भाषा का शब्द है. उसका अर्थ होता है “पाक या शुद्धी करने वाला.” ज़कात अल-माल “सम्पत्ती पर ज़कात” या “ज़काह” इस्लाम (Islam) में एक प्रकार का “दान देना” है, जिसको धार्मिक रूप से ज़रूरी क़रार दिया गया है. इस दिए जाने वाले दान का रक़म सदक़ा कहते हैं. सदक़ा देने की प्रक्रिया को ज़कात कहा जाता है.

ज़कात क्या है और रमज़ान में ही इसे क्यों अदा करते हैं ?

इस्लाम में ज़कात की अहमियत

इस्लाम में ज़कात की अहमियत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि कुरआन में 82 बार सलात(नमाज़) क़ायम करने और ज़कात अदा करने का हुक्म आया है. यानि सलात (नमाज़) के बाद ज़कात ही का मक़ाम है. शरीयत में ज़कात उस माल को कहते हैं जिसे इंसान अल्लाह के दिए हुए माल में से उसके हक़दारों के लिए निकालता है. ज़कात इस्लाम के पांच मूल स्तंभों में से एक है. हर मुसलमान को अपने धन में से ज़कात की अदायगी ज़रूरी है. शरीयत के मुताबिक हर एक समर्पित मुसलमान को अपनी सालाना बचत का 2.5 % हिस्सा ज़कात के हक़दारों को देना ज़रूरी है. ज़कात अदा किए बगैर एक मुसलमान की कमाई हलाल नहीं मानी जाती.

क़ुरआन में ज़कात

क़ुरआन में सलात(नमाज़) के साथ ज़कात शब्द का इस्तेमाल 82 बार इस्तेमाल हुआ है. ज़कात के लिए सदक़ा लफ्ज़ का भी जगह जगह इस्तेमाल किया गया है. क़ई जगह इंफाक़ का लफ़्ज़ भी इस्तेमाल हुआ है. कुरआन की सूरः अल बक़रा की आयत न. 277 में कहा गया है, निस्संदेह जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए और नमाज़ क़ायम की और ज़कात दी, उनके लिए उनका बदला उनके रब के पास है, और उन्हें न कोई भय हो और न वे शोकाकुल होंगे. वहीं सूरः अल अनआम की आयत न. 141 कहती है, जब ये चीज़े फलें तो उनका फल खाओ और उन चीज़ों के काटने के दिन ख़ुदा का हक़ (ज़कात) दे दो और ख़बरदार फज़ूल ख़र्ची न करो क्यों कि वह (ख़ुदा) फुज़ूल ख़र्चे से हरगिज़ उल्फ़त नहीं रखता.

हदीस में ज़कात

हदीसों के मुताबिक़ पैग़बंर- इस्लाम हज़रत मुहम्मद (सअव) ने ज़कात को सख़्ती से अदा करने का हुक्म दिया है. सही बुखारी में आया है कि पैग़बंर- इस्लाम हज़रत मुहम्मद (सअव) ने कहा, मैं तुम्हें चार कामों का हुक्म देता हूं और चार कामों से रोकता हूं. मैं तुम्हें ईमान बिल्लाह का हुक्म देता हूं तुम्हें मालूम है कि ईमान बिल्लाह क्या है? उसकी गवाही देना है कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं और नमाज़ क़ायम करना और ज़कात देने और ग़नीमत में पांचवा हिस्सा देने का हुक्म देता हूं. एक और हदीस के मुताबिक़ नबी ने कहा को हर वो मुसलमान ज़कात अदा करेगा जिसके पास पाँच सात तोला (70 ग्राम) सोना या औकिया (52 तोला 6 मासा) से कम चाँदी है. पाँच ऊंट से कम पर ज़कात नहीं है और पाँच अवाक (खाद्यान्नों का एक विशेष माप,34 मन गल्ला) से कम पर ज़कात नहीं है.

ज़कात का मक़सद

ज़कात का मक़सद मक़सद समाज में अमीरी-ग़रीबी के फ़र्क़ को मिटाना है. इसी लिए इस्लाम ने समाज के अमीर लोगों की कमाई हुई दौलत में समाज के कमज़ोर तबके का हिस्सा तय कर दिया है और इसे उन तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी भी डाल दी है. इसे क़ुरआनकी सूरः अल हश्र की आयत न. 7 से समझा जा सकता है. ये सूरः कहती है, जो कुछ अल्लाह ने अपने रसूल की ओर बस्तियों वालों से लेकर पलटाया वह अल्लाह और रसूल और (मुहताज) नातेदार और अनाथों और मुहताजों और मुसाफ़िर के लिए है, ताकि वह (माल) तुम्हारे मालदारों ही के बीच चक्कर न लगाता रहे. रसूल जो कुछ तुम्हें दे उसे ले लो और जिस चीज़ से तुम्हें रोक दे उससे रुक जाओ, और अल्लाह का डर रखो. निश्चय ही अल्लाह की यातना बहुत कठोर है.

ज़कात किसको दे सकते हैं

जैसे कुरआन ने ज़कात और इसकी अहमियत को खुलकर बयान किया है ठीक उसी तरह ये भी बता दिया है कि ज़कात किसको दी जानी चाहिए. कुरआन की सूरः अत तौबा में कहा गया है, सदक़ा तो बस ग़रीबों, मुहताजों और उन लोगों के लिए हैं, जो इस काम पर नियुक्त हों और उनके लिए जिनके दिलों को अपनी तरफ़ खींचना हो, गर्दनों को छुड़ाने और क़र्ज़दारों और तावान भरनेवालों की सहायता करने में, अल्लाह के मार्ग में, मुसाफ़िरों की सहायता करने में लगाने के लिए हैं. यह अल्लाह की ओर से ठहराया हुआ हुक्म है. अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, अत्यन्त तत्वदर्शी है.

ज़कात किसको नहीं दे सकते

जैसे ये साफ़ है कि किसके दी जा सकती है. उसी तरह य भी साफ है कि ज़कात किसको नहीं दी जा सकती. कुरआन के मुताबिक एक मुसलमान पर जिन लोगों का खर्च उठाने की ज़िम्मेदारी होती है उन्हें ज़कात नहीं दी जा सकती. कुरआन ने मा-बाप की ख़िदमत के फर्ज़ करार दिया है. पत्नी के आजीवन भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी पति को सौंपा है. बच्चों के लालन पालन से लेकर उनकी हर ज़रूरत पूरी करने की की ज़िम्मेदारी तय की है. लिहाज़ा ज़कात का पैसा या सदक़ा मां-बाप, पति-पत्नी या बेटे और बेटियों को नहीं दिया जा सकता. लेकिन भाई बहनों और उनके बच्चों को दिया जा सकता है. क्योंकि उनके खर्चों की जिम्मेदारी आप पर तय नहीं की गई है.

रमज़ान में ही क्यों अदा की जाती है ज़कात

वैसे तो ज़कात कभी भी अदा की जा सकती है. ज़कात का सारा पैसा एक सा भी दिया जा सकत है और थोड़ा-थोड़ा करके भी इसे अदा किया जा सकता. ज़कात का पूरा पैसा किसी एक व्यक्ति को भी दिया जा सकता है और उसे कई लोगों के बीच उनकी ज़रूरत के हिसाब से भी दिया जा सकता है. इस्लाम में रमज़ान के महीने को पवित्र माना जाता है. मान्यता के मुताबिक रमज़ान में किए ग नका काम का ज्यादा सवाब (पुण्य) मिलता है. लिहाज़ा मुसलमानों में रमज़ान के महीने में ही ज़कात अदा करने का चलन बन गया है. ज़्यादातर मुसलमान साल भर ज़रूरतमंदों को थोड़ी-थोड़ी मदद करते रहते हैं. लेकिन रमज़ान के महीने में हिसाब किताब लगाकर पूरी ज़कात अदा करते हैं.

ज़रूरी है ज़कात का सही प्रबंधन

ऐसा दावा किया जाता है जिन मुसलमानों पर ज़कात फ़र्ज़ है वो हर साल अपनी ज़कात का पैसा ज़कात के मुस्तहिक़ लोगों में बांटते हैं. रमज़ान में अमीरों के घरों के बाहर ज़कात लेने वालों का तांता लगा होता है. लेकिन सवाल उठता है कि इस सबके बावजूद मुसलमानों के बीच ग़रीबी दूर क्यों नहीं हो रही? इसकी बड़ी वजह है कि आम मुसलमान ज़कात की अहमियत और इसके असली मक़सद को नहीं समझते. इस वजह से उनकी ज़कात वहां पहुंच ही नहीं रही जहां उसे पहुंचना चाहिए. ज़क़ात का बड़ा हिस्सा मदरसों के निर्माण और उनके संचालन पर ख़र्च हो रहा है. जबकि ज़कात के असली हक़दारों तक इसका पहुंचता छोटा हिस्सा पहुंचता है. इसी लिए मुस्लिम समाज में ग़रीबी बनी हुई है. ज़कात का असली मक़सद ग़रीबी उन्मूलन है. अगर ये मकसद पूरा नहीं हो रहा है तो साफ़ है लेकिन मौजूदा मुस्लिम समाज में ज़कात का प्रबंधन सही नहीं है.

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